Saturday, 4 May 2013

शब्द -शब्द संघर्ष कि
बात करते रहे,
ना जाने फिर क्यूँ
वो डरते रहे !
आवाम को नहीं पता
उनके डर का राज ,
कितना निकम्मा हो गया
कलम का सिपाही आज !
रख दो अपनी रोशनाई
घर कि कोठरी में ,
बाध कर रख दो
सारे शब्द एक पोटली में !
ना जाने क्यों बिक गए
उसके सारे शब्द -साज ,
कितना निकम्मा हो गया
कलम का सिपाही आज !

(धर्मेन्द्र सिंह कौशिक )